समय के चौराहे पर खड़ी सभ्यता
द्वेष की राह को निहार रही है।
ये कौन बताएगा हमें
कि उस पथ का शेष केवल शेष है?
द्वेष की राह को निहार रही है।
ये कौन बताएगा हमें
कि उस पथ का शेष केवल शेष है?
अंतर्भास अन्तर के आभास से आएगा,
ये कौन समझाएगा इस पीढ़ी को
अपने सशक्त, कोमल, तीक्ष्ण, प्रेरक, स्नेही
पंक्तियों से?
ये कौन समझाएगा इस पीढ़ी को
अपने सशक्त, कोमल, तीक्ष्ण, प्रेरक, स्नेही
पंक्तियों से?
कहां चले गए हैं सारे कवि?